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राजनीति के नए प्रवेशद्वार पर अटके भुजबल – राणे!

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राजनीति के नए प्रवेशद्वार पर अटके भुजबल – राणे!

    06-Sep-2019

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अश्विनीकुमार मिश्र – संपादक, निर्भय पथिक

nirbhaypathik@gmail.com
 
एक जमाने में महाराष्ट्र की राजनीति में धमक रखने वाले दो पूर्व शिवसैनिक – नारायण राणे और छगन भुजबल की हालत इन दिनों त्रिशंकु जैसी हो गयी है। क्या संयोग है कि दोनों नेताओं को इच्छित पार्टियोंने प्रवेशद्वार पर रोक दिया है। नारायण राणे ने पिछले सप्ताह अपनी पार्टी स्वाभिमान पक्ष को भाजपा में विलय करने की घोषणा की थी। लगा था कि महाजनादेश यात्रा के दौरान अमित शाह की उपस्थिति में वे भाजपा में ले लिए जायेंगें। लेकिन ऐन वक्त पर यह प्रवेश टल गया। इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस के दिग्गज नेता छगन भुजबल के भी शिवसेना में प्रवेश की चर्चा गरम है। परसों नाशिक में उनके समर्थकों ने उन्हें इस के लिए समर्थन देने का एलान भी किया। लेकिन शिवसेना की ओर से हरी झंडी न मिलने से परसों उनका भी प्रवेश रुक गया। 
 

 
दरअसल दोनों नेता छगन भुजबल और नारायण राणे अपनी राजनीति को नया धार देने के लिए दल बदल और विलय का सहारा ले रहे हैं। फिलहाल दोनों अनिश्चितता के वातावरण में हैं। नारायण राणेने भाजपा का रास्ता पकड़ा है, जबकि छगन भुजबल की घर वापसी की तैयारी है। लेकिन इन दोनों का किसी न किसी तरह का राजनीतिक विरोध है। छगन भुजबल जहां ओबीसी राजनीति के दमदार नेता हैं और इसका लाभ शिवसेना को मिल सकता है। लेकिन शिवसेना की नाशिक इकाई में उनके प्रवेश को लेकर कुर कुर चल रहा है। उधर नारायण राणे का भाजपा प्रवेश को शिवसेना से जोड़ कर देखा जा रहा है। खबर है कि भाजपा कोंकण में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नारायण राणे को मूल्यवान समझ रही है. जबकि शिवसेना इसलिए उनके भाजपा प्रवेश को लेकर अस्वस्थ है। उधर छगन भुजबल को शिवसेना में लेनेपर शिवसेना की कई इलाकों में स्थिति मजबूत हो सकती है। लेकिन विधि का विधान देखिये कि, दोनों नेताओं को अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

इन दोनों पूर्व शिवसैनिकों को कारण अटकना पड़ा है। वैसे इन दोनों नेताओं के पाला बदलने के बाद की राजनीति दिलचस्प हो सकती है। आने वाले दिनों में इन दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका देखने लायक होगी. क्योंकि दोनों नेताओं को अपना कुनबा भी ज़माना है। नारायण राणे के नितेश राणे कांग्रेस के विधायक बने हुए हैं, जबकि नीलेश राणे का राजनीतिक धरातल फिलहाल मजबूत नहीं कहा जा सकता। हलांकि नारायण राणे के ये दोनों बेटे कोंकण के रत्नागिरी और सिंधुदूर्ग में काम कर रहे हैं। उसी तरह छगन भुजबल का परिवार भी नासिक-येवले क्षेत्र में गढ़ बना रखा है। वैसे दोनों नेता फिलहाल अपनी उपयोगिता साबित करने में लगे हैं। एक चर्चा यह भी है कि नारायण राणे 19 सितम्बर को प्रधानमंत्री की उपस्थिति में भाजपा का दामन थाम सकते हैं।
 
 
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“अश्विनीकुमार मिश्र – संपादक, निर्भय पथिक

nirbhaypathik@gmail.com
 
एक जमाने में महाराष्ट्र की राजनीति में धमक रखने वाले दो पूर्व शिवसैनिक – नारायण राणे और छगन भुजबल की हालत इन दिनों त्रिशंकु जैसी हो गयी है। क्या संयोग है कि दोनों नेताओं को इच्छित पार्टियोंने प्रवेशद्वार पर रोक दिया है। नारायण राणे ने पिछले सप्ताह अपनी पार्टी स्वाभिमान पक्ष को भाजपा में विलय करने की घोषणा की थी। लगा था कि महाजनादेश यात्रा के दौरान अमित शाह की उपस्थिति में वे भाजपा में ले लिए जायेंगें। लेकिन ऐन वक्त पर यह प्रवेश टल गया। इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस के दिग्गज नेता छगन भुजबल के भी शिवसेना में प्रवेश की चर्चा गरम है। परसों नाशिक में उनके समर्थकों ने उन्हें इस के लिए समर्थन देने का एलान भी किया। लेकिन शिवसेना की ओर से हरी झंडी न मिलने से परसों उनका भी प्रवेश रुक गया। 
 

 
दरअसल दोनों नेता छगन भुजबल और नारायण राणे अपनी राजनीति को नया धार देने के लिए दल बदल और विलय का सहारा ले रहे हैं। फिलहाल दोनों अनिश्चितता के वातावरण में हैं। नारायण राणेने भाजपा का रास्ता पकड़ा है, जबकि छगन भुजबल की घर वापसी की तैयारी है। लेकिन इन दोनों का किसी न किसी तरह का राजनीतिक विरोध है। छगन भुजबल जहां ओबीसी राजनीति के दमदार नेता हैं और इसका लाभ शिवसेना को मिल सकता है। लेकिन शिवसेना की नाशिक इकाई में उनके प्रवेश को लेकर कुर कुर चल रहा है। उधर नारायण राणे का भाजपा प्रवेश को शिवसेना से जोड़ कर देखा जा रहा है। खबर है कि भाजपा कोंकण में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नारायण राणे को मूल्यवान समझ रही है. जबकि शिवसेना इसलिए उनके भाजपा प्रवेश को लेकर अस्वस्थ है। उधर छगन भुजबल को शिवसेना में लेनेपर शिवसेना की कई इलाकों में स्थिति मजबूत हो सकती है। लेकिन विधि का विधान देखिये कि, दोनों नेताओं को अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

इन दोनों पूर्व शिवसैनिकों को कारण अटकना पड़ा है। वैसे इन दोनों नेताओं के पाला बदलने के बाद की राजनीति दिलचस्प हो सकती है। आने वाले दिनों में इन दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका देखने लायक होगी. क्योंकि दोनों नेताओं को अपना कुनबा भी ज़माना है। नारायण राणे के नितेश राणे कांग्रेस के विधायक बने हुए हैं, जबकि नीलेश राणे का राजनीतिक धरातल फिलहाल मजबूत नहीं कहा जा सकता। हलांकि नारायण राणे के ये दोनों बेटे कोंकण के रत्नागिरी और सिंधुदूर्ग में काम कर रहे हैं। उसी तरह छगन भुजबल का परिवार भी नासिक-येवले क्षेत्र में गढ़ बना रखा है। वैसे दोनों नेता फिलहाल अपनी उपयोगिता साबित करने में लगे हैं। एक चर्चा यह भी है कि नारायण राणे 19 सितम्बर को प्रधानमंत्री की उपस्थिति में भाजपा का दामन थाम सकते हैं।
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“दरअसल दोनों नेता छगन भुजबल और नारायण राणे अपनी राजनीति को नया धार देने के लिए दल बदल और विलय का सहारा ले रहे हैं। फिलहाल दोनों अनिश्चितता के वातावरण में हैं। नारायण राणेने भाजपा का रास्ता पकड़ा है, जबकि छगन भुजबल की घर वापसी की तैयारी है। लेकिन इन दोनों का किसी न किसी तरह का राजनीतिक विरोध है। छगन भुजबल जहां ओबीसी राजनीति के दमदार नेता हैं और इसका लाभ शिवसेना को मिल सकता है। लेकिन शिवसेना की नाशिक इकाई में उनके प्रवेश को लेकर कुर कुर चल रहा है। उधर नारायण राणे का भाजपा प्रवेश को शिवसेना से जोड़ कर देखा जा रहा है। खबर है कि भाजपा कोंकण में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नारायण राणे को मूल्यवान समझ रही है. जबकि शिवसेना इसलिए उनके भाजपा प्रवेश को लेकर अस्वस्थ है। उधर छगन भुजबल को शिवसेना में लेनेपर शिवसेना की कई इलाकों में स्थिति मजबूत हो सकती है। लेकिन विधि का विधान देखिये कि, दोनों नेताओं को अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में जद्दोजहद करनी पड़ रही है।”
“इन दोनों पूर्व शिवसैनिकों को कारण अटकना पड़ा है। वैसे इन दोनों नेताओं के पाला बदलने के बाद की राजनीति दिलचस्प हो सकती है। आने वाले दिनों में इन दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका देखने लायक होगी. क्योंकि दोनों नेताओं को अपना कुनबा भी ज़माना है। नारायण राणे के नितेश राणे कांग्रेस के विधायक बने हुए हैं, जबकि नीलेश राणे का राजनीतिक धरातल फिलहाल मजबूत नहीं कहा जा सकता। हलांकि नारायण राणे के ये दोनों बेटे कोंकण के रत्नागिरी और सिंधुदूर्ग में काम कर रहे हैं। उसी तरह छगन भुजबल का परिवार भी नासिक-येवले क्षेत्र में गढ़ बना रखा है। वैसे दोनों नेता फिलहाल अपनी उपयोगिता साबित करने में लगे हैं। एक चर्चा यह भी है कि नारायण राणे 19 सितम्बर को प्रधानमंत्री की उपस्थिति में भाजपा का दामन थाम सकते हैं।”
 
 
 
NARAYA RANECHHAGAN BHUJBALSHIVSENA

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