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पवार साहब! दिल्ली की तख़्त पर कोई औरंगजेब नहीं बैठा है!!
30-Sep-2019
”
अश्विनीकुमार मिश्र..
देश के दिग्गज भ्रष्टाचारी नेता अपनी करतूतों पर शर्माने की बजाय शिवाजी महाराज के बोल बोलकर मराठी अस्मिता को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। महाराष्ट्र की अस्मिता का इतना ही भान पवार साहब को होता तो इस राज्य में कई घोटालों का जन्म ही नहीं होता। राज्य को लूटने से पहले शरीर जरूर कांपता। शिवाजी महाराज ने मुग़ल शासन को चुनौती देते हुए कहा था कि मराठा साम्राज्य दिल्ली की तख़्त के आगे घुटने नहीं टेकेगा। उस संवाद का उपयोग आज राष्ट्रवादी कांग्रेस के सुप्रीमो शरद पवार कर रहे हैं। इस से यह साबित होता है पवार साहब इतिहास का सन्दर्भ भूल गए हैं और अपनी काली करतूतों पर पर्दा डालने के लिए वे शिवाजी महाराज का सहारा ले रहे हैं, जो उनके लिए अनुचित है।
जब शिवाजी महाराज ने ये बोल कहे थे तो देश मुग़ल आक्रांताओं के अत्याचार से त्रस्त था। तब मुगलों की सत्ता उखाड़ने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलिया सल्तनत को चुनौती दी थी। यहाँ शरद बाबू तो चुनी गई सरकार को चुनौती दे रहे हैं, वह भी इसलिए कि राज्य में हुए भ्रष्टाचार की जांच करा रहा है.. यह तो वही बात हुई कि चोरी और सीनाजोरी। अगर पवार साहब बेदाग़ हैं तो उन्हें राजनीतिक बयान देने के बजाये कानूनी जवाब देना चाहिए। महाराष्ट्र सहकारी बैंक में घोटाला हुआ है, पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज होने के बाद कार्रवाई हुई है। तो इसमें दिल्ली के तख़्त को बेवजह चुनौती क्यों दे रहे हैं? आज वह मुंबई के प्रवर्तन निदेशालय में नहीं गए। यह उन्होंने ठीक किया, नहीं तो इस घटना से चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत साबित हो सकता था। शरद पवार अपने ऊपर हुई कार्रवाई से इतने व्यथित हुए हैं कि उन्होंने केंद्र सरकार को औरंगजेब की सरकार के साथ खड़ा करने की कोशिश की है, जो हास्यास्पद है। शरद पवार जैसे नेता एक चुनी हुई सरकार को दिल्ली का तख़्त घोषित करते हुए अपने तथा अपने बगलबच्चों के आर्थिक अपराधों पर पर्दा नहीं डाल सकते..
भले ही पवार पर की जाने वाली कार्रवाई चुनाव के समय हुई है, लेकिन इस से केंद्र सरकार ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार में लिप्त किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जायेगा। चिदम्बरं जैसे नेता आज तिहाड़ जेल में हैं। सरकार की इस कार्रवाई की आम आदमी के जनमानस में अच्छी प्रतिक्रिया हुई है। वे खुश हैं कि बहुत दिनों बाद बड़ी मछलियों को जाल में डाला जा रहा है। आम लोग केंद्र की मोदी सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम से खुश हैं, इसलिए पवार शिवाजी वाले बयान का लाभ नहीं ले पायेंगें। आज बड़ी बड़ी कंपनियां, बैंक, तथा दबंग नेताओं पर कानूनी शिकंजा कैसा जा रहा है। जिन नेताओं ने देश कको धन को चारा समझ कर गड़प लिया था आज सलाखों के पीछे है। इसे राजनीतिक वैमनसीटा कह कर अपना दामन बचाने वाले नेता समझ लें कि देश दूषण फ़ैलाने वाले सत्ताखोर नौकर शाह बच नहीं सकते। उत्पाद विभाग, आयकर विभाग के भ्रष्ट अधिकारी नियमों को ताख पर रख कर नेताओं के साथ देश के धन को लूटा है। वैसे लोग भी आज दण्डित किये जा रहे हैं।
जनमानस में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष है और ऐसे किसी भी मुहीम का वे समर्थन करते हैं। देश का इतिहास रहा है जब भी कोई घोटाले में कोई बड़े नेता या आदमी का नाम आता था जांच ठंढी पड़ जाती थी। किसी भी बड़े नेता या अफसर को कभी धरा नहीं गया, धरा भी गया तो कालांतर में उसे छोड़ दिया गया। इस तरह से देश में भ्रष्टाचार का एक तंत्र खड़ा हो गया था जो घुन की तरह देश के चरित्र और धन को खोखला कर रहा था। महाराष्ट्र सहकारी बैंक में हुआ 1500 करोड़ का घोटालाका जिम्मेदार कौन है? क्या यह पता नहीं लगाया जाना चाहिए? जांच के दायरे में नेता को लाया गया तो इतनी चिढ की प्रवर्तन निदेशालय को पार्टी के गुंडों से धमकाने निकल पड़े? मराठी अस्मिता का ख्याल है तो लूटी हुई नागरी संपत्ति को वापस दिलाने में अपनी शक्ति के जरिये क़ानून की मदद करनी चाहिए।”
अश्विनीकुमार मिश्र..
“देश के दिग्गज भ्रष्टाचारी नेता अपनी करतूतों पर शर्माने की बजाय शिवाजी महाराज के बोल बोलकर मराठी अस्मिता को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। महाराष्ट्र की अस्मिता का इतना ही भान पवार साहब को होता तो इस राज्य में कई घोटालों का जन्म ही नहीं होता। राज्य को लूटने से पहले शरीर जरूर कांपता। शिवाजी महाराज ने मुग़ल शासन को चुनौती देते हुए कहा था कि मराठा साम्राज्य दिल्ली की तख़्त के आगे घुटने नहीं टेकेगा। उस संवाद का उपयोग आज राष्ट्रवादी कांग्रेस के सुप्रीमो शरद पवार कर रहे हैं। इस से यह साबित होता है पवार साहब इतिहास का सन्दर्भ भूल गए हैं और अपनी काली करतूतों पर पर्दा डालने के लिए वे शिवाजी महाराज का सहारा ले रहे हैं, जो उनके लिए अनुचित है।”
“जब शिवाजी महाराज ने ये बोल कहे थे तो देश मुग़ल आक्रांताओं के अत्याचार से त्रस्त था। तब मुगलों की सत्ता उखाड़ने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलिया सल्तनत को चुनौती दी थी। यहाँ शरद बाबू तो चुनी गई सरकार को चुनौती दे रहे हैं, वह भी इसलिए कि राज्य में हुए भ्रष्टाचार की जांच करा रहा है.. यह तो वही बात हुई कि चोरी और सीनाजोरी। अगर पवार साहब बेदाग़ हैं तो उन्हें राजनीतिक बयान देने के बजाये कानूनी जवाब देना चाहिए। महाराष्ट्र सहकारी बैंक में घोटाला हुआ है, पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज होने के बाद कार्रवाई हुई है। तो इसमें दिल्ली के तख़्त को बेवजह चुनौती क्यों दे रहे हैं? आज वह मुंबई के प्रवर्तन निदेशालय में नहीं गए। यह उन्होंने ठीक किया, नहीं तो इस घटना से चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत साबित हो सकता था। शरद पवार अपने ऊपर हुई कार्रवाई से इतने व्यथित हुए हैं कि उन्होंने केंद्र सरकार को औरंगजेब की सरकार के साथ खड़ा करने की कोशिश की है, जो हास्यास्पद है। शरद पवार जैसे नेता एक चुनी हुई सरकार को दिल्ली का तख़्त घोषित करते हुए अपने तथा अपने बगलबच्चों के आर्थिक अपराधों पर पर्दा नहीं डाल सकते..”
“भले ही पवार पर की जाने वाली कार्रवाई चुनाव के समय हुई है, लेकिन इस से केंद्र सरकार ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार में लिप्त किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जायेगा। चिदम्बरं जैसे नेता आज तिहाड़ जेल में हैं। सरकार की इस कार्रवाई की आम आदमी के जनमानस में अच्छी प्रतिक्रिया हुई है। वे खुश हैं कि बहुत दिनों बाद बड़ी मछलियों को जाल में डाला जा रहा है। आम लोग केंद्र की मोदी सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम से खुश हैं, इसलिए पवार शिवाजी वाले बयान का लाभ नहीं ले पायेंगें। आज बड़ी बड़ी कंपनियां, बैंक, तथा दबंग नेताओं पर कानूनी शिकंजा कैसा जा रहा है। जिन नेताओं ने देश कको धन को चारा समझ कर गड़प लिया था आज सलाखों के पीछे है। इसे राजनीतिक वैमनसीटा कह कर अपना दामन बचाने वाले नेता समझ लें कि देश दूषण फ़ैलाने वाले सत्ताखोर नौकर शाह बच नहीं सकते। उत्पाद विभाग, आयकर विभाग के भ्रष्ट अधिकारी नियमों को ताख पर रख कर नेताओं के साथ देश के धन को लूटा है। वैसे लोग भी आज दण्डित किये जा रहे हैं।”
“जनमानस में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष है और ऐसे किसी भी मुहीम का वे समर्थन करते हैं। देश का इतिहास रहा है जब भी कोई घोटाले में कोई बड़े नेता या आदमी का नाम आता था जांच ठंढी पड़ जाती थी। किसी भी बड़े नेता या अफसर को कभी धरा नहीं गया, धरा भी गया तो कालांतर में उसे छोड़ दिया गया। इस तरह से देश में भ्रष्टाचार का एक तंत्र खड़ा हो गया था जो घुन की तरह देश के चरित्र और धन को खोखला कर रहा था। महाराष्ट्र सहकारी बैंक में हुआ 1500 करोड़ का घोटालाका जिम्मेदार कौन है? क्या यह पता नहीं लगाया जाना चाहिए? जांच के दायरे में नेता को लाया गया तो इतनी चिढ की प्रवर्तन निदेशालय को पार्टी के गुंडों से धमकाने निकल पड़े? मराठी अस्मिता का ख्याल है तो लूटी हुई नागरी संपत्ति को वापस दिलाने में अपनी शक्ति के जरिये क़ानून की मदद करनी चाहिए।”
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