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“आत्ममंथन नहीं, आत्म प्रवंचन करे कांग्रेस”
01-Jul-2019
”
अश्विनीकुमार मिश्र, संपादक,निर्भय पथिक
[email protected] com
कांग्रेस में इन दिनों आत्ममंथन और आत्मप्रवंचन का दौर चल रहा है, इस्तीफे दिए जा चुके हैं, पार्टी में घुसे हुए चापलूसों की खोज चल रही है। कहीं पुराने क्षत्रपों को समझाइश दी जा रही है। राहुल गांधी वरिष्ठों से नाराज चल रहे हैं और राहुल की पीढ़ी पार्टी पर आसीन होने के लिए कुलबुला रही है। यह पीढ़ी पार्टी में नया जोश भरने को आतुर है, इस क्रम में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, रणजीत सिंह सुरजेवाला सहित कई नेता कांग्रेस के चुके हुए नेताओं का बोझ ढो रहे है। आज भी राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, झारखंड और तेलंगाना कांग्रेस में बवाल मचा है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब में सत्ता प्राप्ति के बाद भी अंतरकलह बरकरार है। मध्य प्रदेश में सिंधिया की वर्षों की मेहनत पर कमलनाथ और राजस्थान में सचिन पायलट की मेहनत पर अशोक गहलोत ने पानी फेर दिया। कांग्रेस हाईकमान के इन निर्णयों की वजह से नई पीढ़ी हताश है और ऊपर से लोकसभा की हार ने उनमें अकुलाहट पैदा कर दी है। कांग्रेस के पुराने घिसे पिटे नेताओं की फौज अपनी मौज में पार्टी की लुटिया डुबो रहे हैं, उस पर से भारतीय जनता पार्टी उनके लिए नित नई चुनौतियों खड़ी कर रही है। दरअसल इतने दिनों तक सत्ता में रहने के कारण कांग्रेस की पूरी मशीनरी कुंद हो गई है।
संसद से लेकर ब्लॉक स्तर तक कार्यकर्ताओं का अभाव है। इसके वितरीत भाजपा नित नए कार्यक्रमों के जरिये अपने कैडर को सक्रिय रखे हुए है। इस सक्रियता में भाजपा का पार्टी नेतृत्व 24×7 काम कर रहा है, जिससे, वह हमेशा चुनावी मोड में ही रहने लगी है, वैसा कुछ कांग्रेस में नहीं हो रहा। यह सुना जा रहा है कि बूथ स्तर से सूचनाएं एकत्रित की जा रही हैं। राहुल गांधी फिलहाल दक्षिण की ओर है और अपना नए सूत्र का प्रतिपादन कर रहे हैं। उनकी राजनीतिक सोच का पैमाना बचकाना लगता है। एक तो पार्टी चुनाव हार चुकी है। उसका विश्लेषण संगठन के आधार पर होना चाहिए, लेकिन ऐसा न कर वह अपने वरिष्ठों को नाराज नहीं करना चाह रहे हैं। दरअसल जनमत की आवाज को न समझ कर कुछ और ही विवेचन करना गलत है। चुनाव प्रचार में राहुल ने जो आरोप लगाए और जो मुद्दे उठाए, उसपर विचार होना चाहिए। बेरोजगारी के नाम पर युवकों को भड़काने और किसानों की समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद करना राहुल के काम नहीं आया। चुनाव परिणाम में समस्याग्रस्त किसान और बेरोजगार युवाओं ने मोदी को भर- भर के वोट दिए। दरअसल राहुल ने चुनाव प्रचार में वास्तविकता से कम प्रोपगंडा पर ज्यादा बल दिया। इसके साथ बालाकोट की घटनाओं पर कांग्रेस का नजरिया लोगों को पसंद नहीं आया।
राहुल जिस बेरोजगारी की समस्या को उठा रहे थे, वह भी एक अर्धसत्य था। बेरोजगारी देश की पुरानी समस्या है। इस के विपरीत उन्हें देश के सामने ब्लूप्रिंट रखा चाहिए था, विकास का नया मॉडल सामने रखना चाहिए था। लोगों को गुस्सा न्याय योजना को लेकर भी था, जब कांग्रेस शासन में थी तो लागू क्यों नहीं किया, यह सहज प्रश्न लोगों को और नाराज कर गया। चलिए मान भी लिया कि मोदी सरकार बड़ी फेल्योर थी, तो भी जो निर्णय देश ने सुनाया है, उसे स्वीकार करने की बजाय अपने लोक सभा क्षेत्र में मोदी के खिलाफ जहर उगलना शायद उचित नहीं है। इससे अच्छा है कि हार की छाया से निकलकर वे हर राज्य में अपनी नई टीम बनाएं, ताकि कांग्रेस का संगठन जीवंत हो सके, इसके लिए जनमत को अंतर्मन से स्वीकार करना होगा।”
“अश्विनीकुमार मिश्र, संपादक,निर्भय पथिक
[email protected] com
कांग्रेस में इन दिनों आत्ममंथन और आत्मप्रवंचन का दौर चल रहा है, इस्तीफे दिए जा चुके हैं, पार्टी में घुसे हुए चापलूसों की खोज चल रही है। कहीं पुराने क्षत्रपों को समझाइश दी जा रही है। राहुल गांधी वरिष्ठों से नाराज चल रहे हैं और राहुल की पीढ़ी पार्टी पर आसीन होने के लिए कुलबुला रही है। यह पीढ़ी पार्टी में नया जोश भरने को आतुर है, इस क्रम में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, रणजीत सिंह सुरजेवाला सहित कई नेता कांग्रेस के चुके हुए नेताओं का बोझ ढो रहे है। आज भी राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, झारखंड और तेलंगाना कांग्रेस में बवाल मचा है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब में सत्ता प्राप्ति के बाद भी अंतरकलह बरकरार है। मध्य प्रदेश में सिंधिया की वर्षों की मेहनत पर कमलनाथ और राजस्थान में सचिन पायलट की मेहनत पर अशोक गहलोत ने पानी फेर दिया। कांग्रेस हाईकमान के इन निर्णयों की वजह से नई पीढ़ी हताश है और ऊपर से लोकसभा की हार ने उनमें अकुलाहट पैदा कर दी है। कांग्रेस के पुराने घिसे पिटे नेताओं की फौज अपनी मौज में पार्टी की लुटिया डुबो रहे हैं, उस पर से भारतीय जनता पार्टी उनके लिए नित नई चुनौतियों खड़ी कर रही है। दरअसल इतने दिनों तक सत्ता में रहने के कारण कांग्रेस की पूरी मशीनरी कुंद हो गई है।
संसद से लेकर ब्लॉक स्तर तक कार्यकर्ताओं का अभाव है। इसके वितरीत भाजपा नित नए कार्यक्रमों के जरिये अपने कैडर को सक्रिय रखे हुए है। इस सक्रियता में भाजपा का पार्टी नेतृत्व 24×7 काम कर रहा है, जिससे, वह हमेशा चुनावी मोड में ही रहने लगी है, वैसा कुछ कांग्रेस में नहीं हो रहा। यह सुना जा रहा है कि बूथ स्तर से सूचनाएं एकत्रित की जा रही हैं। राहुल गांधी फिलहाल दक्षिण की ओर है और अपना नए सूत्र का प्रतिपादन कर रहे हैं। उनकी राजनीतिक सोच का पैमाना बचकाना लगता है। एक तो पार्टी चुनाव हार चुकी है। उसका विश्लेषण संगठन के आधार पर होना चाहिए, लेकिन ऐसा न कर वह अपने वरिष्ठों को नाराज नहीं करना चाह रहे हैं। दरअसल जनमत की आवाज को न समझ कर कुछ और ही विवेचन करना गलत है। चुनाव प्रचार में राहुल ने जो आरोप लगाए और जो मुद्दे उठाए, उसपर विचार होना चाहिए। बेरोजगारी के नाम पर युवकों को भड़काने और किसानों की समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद करना राहुल के काम नहीं आया। चुनाव परिणाम में समस्याग्रस्त किसान और बेरोजगार युवाओं ने मोदी को भर- भर के वोट दिए। दरअसल राहुल ने चुनाव प्रचार में वास्तविकता से कम प्रोपगंडा पर ज्यादा बल दिया। इसके साथ बालाकोट की घटनाओं पर कांग्रेस का नजरिया लोगों को पसंद नहीं आया।
राहुल जिस बेरोजगारी की समस्या को उठा रहे थे, वह भी एक अर्धसत्य था। बेरोजगारी देश की पुरानी समस्या है। इस के विपरीत उन्हें देश के सामने ब्लूप्रिंट रखा चाहिए था, विकास का नया मॉडल सामने रखना चाहिए था। लोगों को गुस्सा न्याय योजना को लेकर भी था, जब कांग्रेस शासन में थी तो लागू क्यों नहीं किया, यह सहज प्रश्न लोगों को और नाराज कर गया। चलिए मान भी लिया कि मोदी सरकार बड़ी फेल्योर थी, तो भी जो निर्णय देश ने सुनाया है, उसे स्वीकार करने की बजाय अपने लोक सभा क्षेत्र में मोदी के खिलाफ जहर उगलना शायद उचित नहीं है। इससे अच्छा है कि हार की छाया से निकलकर वे हर राज्य में अपनी नई टीम बनाएं, ताकि कांग्रेस का संगठन जीवंत हो सके, इसके लिए जनमत को अंतर्मन से स्वीकार करना होगा।”

