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धोनी हैं तो होनी है..
01-Jul-2019
”
अश्विनीकुमार मिश्र, संपादक,निर्भय पथिक,
[email protected] com
आज पता नहीं क्यों, धोनी के बारे में लिखने को मन करता है। उस दिन सेमी फाइनल में उनका आउट होना अखर गया। एक जीवट भरी पारी खेलते हुए मैदान में वह अंगद की तरह पाँव जमा चुके थे। लेकिन उसी पाँव ने उन्हें गफलत में डाल दिया। और धोनी जीत के अभियान में पिछड़ गए। हालाँकि कमेंट्री बॉक्स से चिंताएं व्यक्त होने लगी थी। एकदम लड़खड़ा चुकी पारी को जीत के मुहाने तक वह ले आये थे। एक छक्का भी लगाया ताकि वह जीत की सीमाओं को छू सकें। महेंद्र सिंह धोनी संघर्ष, संयम और धीरता का नाम है जो जीत खींच कर लाने की क्षमता रखता है। ऐसा उन्होंने कई बार सिद्ध भी किया है। इसलिए जबतक वह क्रीज पर रहते हैं तो लगता रहता है धोनी हैं तो होनी है। अनहोनी को होनी में बदलने वाले धोनी के लिए उसदिन 10 गेंद पर 25 रन बनाना कोई बड़ा काम नहीं था। वह यह सचमुच कर सकते थे, पर होनी को धोनी नहीं टाल सके और खेल का रंग ही बदल गया। उनके क्रीज पर बने रहने के कारण न्यूजीलैंड के खिलाड़ी के चेहरे पर जीत की मुस्कान नहीं आ पाई थी।
धोनी है तो मुमकिन है कि धमक से पूरा स्टेडियम उत्साहित था। ऐसा लग रहा था धोनी अकेले ही जीत खींच लायेंगें, यही महान गुण और क्षमता उन्हें नायकत्व प्रदान करता है, वह भी स्वाभाविक। क्योंकि धोनी ने क्रिकेट खेल के कई मिथकों को तोड़ा है। इसलिए उनकी असफलता भी सभी को स्पर्श कर जाती है, वह भी इतनी की स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर उन्हें क्रिकेट न छोड़ने का आग्रह कर बैठती हैं। लता जी का यह भाव स्वर लहरियों से निकली आवाज नहीं बल्कि धोनी और उनके जीतते रहने की उत्कट इच्छा से निकला मर्म है। धोनी क्रिकेट सिर्फ जीतने के लिए खेलते हैं। किसी भी विषम परिस्थितियों में विचलित हुए बिना टीम का नेतृत्त्व करना और विश्व कप जितवाना उनकी क्रीड़ा कौशल का प्रमाण है। इसी प्रतिबद्धता के कारण धोनी देश के करोडो क्रिकेट प्रेमियों के सामूहिक अवचेतन में रच बस गए हैं। और शायद इसी आत्मीयता के कारण संगीत साम्राज्ञी लता मंगेशकर को उन्होंने क्रिकेट न छोड़ने की सार्वजनिक अपील करनी पड़ती है। इस तरह की आत्मीय अपील लता दीदी ने पहले किसी खिलाडी के लिए की हो ऐसा मुझे स्मरण नहीं। लता जी ने शायद उस दिन पल पल सेमी फाइनल देख कर ही यह उदगार धोनी के लिए व्यक्त किये होंगे। और हो भी क्यों नहीं क्योंकि भले ही धोने की उम्र बढ़ी हो लेकिन जीतने की ललक उनमें कम नहीं हुई है।
महेंद्र सिंह धोनी ने संघर्षों और मायूसियों के बाद जीवन में जगह बनाई। सफलता प्राप्त करना उनके लिए आसान नहीं था। लाखों युवा उनकी नियति से स्वयं को जोड़कर देखते हैं। वे एक मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ क्रिकेट खेलते रहे हैं, उनके शुरुआती दिनों की चमक दमक को छोड़ दें तो, जब उनके लम्बे बाल हुआ करते थे और वे लम्बे छक्के लगाया करते थे। तब वे टीम में युवा थे और उनकी ज़िम्मेदारियां भिन्न थीं। बहुत जल्द उन्होंने परिवार में बड़े होने की भूमिका को स्वीकार कर लिया, जो उन्हें सौंपी गई थी। कप्तान बनने के बाद वे परिवार के मुखिया की तरह सोचने लगे। उन्होंने उसी तरह क्रिकेट खेला, जैसे किसी मध्यवर्गीय परिवार का मुखिया घर चलाता है। वो अपनी आमदनी और ख़र्चे के अनुपात को महीने की 30 तारीख़ तक खींचकर लाना चाहता है। धोनी ने भी हमेशा चाहा कि वो आख़िरी ओवर तक खेलें। खेल को अंत तक लेकर जाएं।
महेंद्र सिंह धोनी ने आजीवन निचले क्रम पर बल्लेबाज़ी की। यह कठिन और धैर्यपूर्ण दायित्व है। ऊपरी क्रम पर बल्लेबाज़ी करने वाला शाहख़र्च होता है। निचले क्रम पर खेलने वाला बल्लेबाज़ किफ़ायती होता है। भारतीय समाज में अभाव, संघर्ष और आत्मत्याग के रूपक इतने गहरे हैं कि उसे धोनी में अपनी नियति दिखलाई देने लगती है। वो उसकी विवशताओं को समझता है। वो उसे परिवार के उस अग्रज की तरह लगता है, जो कष्ट सहकर भी सबके सुख का ख़याल रखता है। वो उस मां की तरह भी है, जो सबसे अंत में भोजन करती है और जितना मिलता है, उससे संतोष करती है। शायद यही कारण था कि उस दिन धोनी ने अपने से युवा, अनुभवहीन और असंयत खिलाड़ियों के नीचे खेलना स्वीकार किया। लेकिन जो खेल वह खेल रहे थे, उस से न्यूजीलैंड के खिलाड़ी मानने लगे थे कि धोनी को आउट करना आसान भी नहीं था। पर हाय रे नियति..
धोनी के खेल की एक विशिष्टता यह भी है कि वह captain never quits the boat early के मंत्र की धुन पर खेलते हैं और खेल के आखिर तक टिके रहने की योजना से खेलते हैं, वह गेंद खेलने में कंजूसी करते हैं और छक्के चौके लगाने में भी वह संयम बरतते हैं ताकि जीत का उत्सव सम्पूर्णता के साथ मनाया जा सके। इसलिए विश्व कप के सेमी -फाइनल में वह बहुत ही संभल कर एक छोर पकडे रहे और दूसरे छोर पर जडेजा का साथ देते रहे। यही एक ईमानदार संयमी खिलाड़ी का जीवन दर्शन होना चाहिए। खेल अंतत: नियमों और कौशल से संचालित होने वाला प्रतिभा है। खिलाड़ी आते हैं, जाते हैं, हार-जीत होती रहती है। किंतु जो व्यक्ति खेल रहा है, उसके व्यक्तित्व के गुण खेल समाप्त होने के बाद भी प्रासंगिक बने रहते हैं। यह सब इसलिए होता है, क्योंकि वह खेल के प्रति एक समर्पित खिलाडी हैं। उनके इस सच्चाई को भारतीय जनमानस पहचान चुका है, शायद इसलिए लता मंगेशकर उन्हें क्रिकेट खेलते रहने का आग्रह कर रही हैं।”
“अश्विनीकुमार मिश्र, संपादक,निर्भय पथिक,
[email protected] com
आज पता नहीं क्यों, धोनी के बारे में लिखने को मन करता है। उस दिन सेमी फाइनल में उनका आउट होना अखर गया। एक जीवट भरी पारी खेलते हुए मैदान में वह अंगद की तरह पाँव जमा चुके थे। लेकिन उसी पाँव ने उन्हें गफलत में डाल दिया। और धोनी जीत के अभियान में पिछड़ गए। हालाँकि कमेंट्री बॉक्स से चिंताएं व्यक्त होने लगी थी। एकदम लड़खड़ा चुकी पारी को जीत के मुहाने तक वह ले आये थे। एक छक्का भी लगाया ताकि वह जीत की सीमाओं को छू सकें। महेंद्र सिंह धोनी संघर्ष, संयम और धीरता का नाम है जो जीत खींच कर लाने की क्षमता रखता है। ऐसा उन्होंने कई बार सिद्ध भी किया है। इसलिए जबतक वह क्रीज पर रहते हैं तो लगता रहता है धोनी हैं तो होनी है। अनहोनी को होनी में बदलने वाले धोनी के लिए उसदिन 10 गेंद पर 25 रन बनाना कोई बड़ा काम नहीं था। वह यह सचमुच कर सकते थे, पर होनी को धोनी नहीं टाल सके और खेल का रंग ही बदल गया। उनके क्रीज पर बने रहने के कारण न्यूजीलैंड के खिलाड़ी के चेहरे पर जीत की मुस्कान नहीं आ पाई थी।
धोनी है तो मुमकिन है कि धमक से पूरा स्टेडियम उत्साहित था। ऐसा लग रहा था धोनी अकेले ही जीत खींच लायेंगें, यही महान गुण और क्षमता उन्हें नायकत्व प्रदान करता है, वह भी स्वाभाविक। क्योंकि धोनी ने क्रिकेट खेल के कई मिथकों को तोड़ा है। इसलिए उनकी असफलता भी सभी को स्पर्श कर जाती है, वह भी इतनी की स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर उन्हें क्रिकेट न छोड़ने का आग्रह कर बैठती हैं। लता जी का यह भाव स्वर लहरियों से निकली आवाज नहीं बल्कि धोनी और उनके जीतते रहने की उत्कट इच्छा से निकला मर्म है। धोनी क्रिकेट सिर्फ जीतने के लिए खेलते हैं। किसी भी विषम परिस्थितियों में विचलित हुए बिना टीम का नेतृत्त्व करना और विश्व कप जितवाना उनकी क्रीड़ा कौशल का प्रमाण है। इसी प्रतिबद्धता के कारण धोनी देश के करोडो क्रिकेट प्रेमियों के सामूहिक अवचेतन में रच बस गए हैं। और शायद इसी आत्मीयता के कारण संगीत साम्राज्ञी लता मंगेशकर को उन्होंने क्रिकेट न छोड़ने की सार्वजनिक अपील करनी पड़ती है। इस तरह की आत्मीय अपील लता दीदी ने पहले किसी खिलाडी के लिए की हो ऐसा मुझे स्मरण नहीं। लता जी ने शायद उस दिन पल पल सेमी फाइनल देख कर ही यह उदगार धोनी के लिए व्यक्त किये होंगे। और हो भी क्यों नहीं क्योंकि भले ही धोने की उम्र बढ़ी हो लेकिन जीतने की ललक उनमें कम नहीं हुई है।
महेंद्र सिंह धोनी ने संघर्षों और मायूसियों के बाद जीवन में जगह बनाई। सफलता प्राप्त करना उनके लिए आसान नहीं था। लाखों युवा उनकी नियति से स्वयं को जोड़कर देखते हैं। वे एक मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ क्रिकेट खेलते रहे हैं, उनके शुरुआती दिनों की चमक दमक को छोड़ दें तो, जब उनके लम्बे बाल हुआ करते थे और वे लम्बे छक्के लगाया करते थे। तब वे टीम में युवा थे और उनकी ज़िम्मेदारियां भिन्न थीं। बहुत जल्द उन्होंने परिवार में बड़े होने की भूमिका को स्वीकार कर लिया, जो उन्हें सौंपी गई थी। कप्तान बनने के बाद वे परिवार के मुखिया की तरह सोचने लगे। उन्होंने उसी तरह क्रिकेट खेला, जैसे किसी मध्यवर्गीय परिवार का मुखिया घर चलाता है। वो अपनी आमदनी और ख़र्चे के अनुपात को महीने की 30 तारीख़ तक खींचकर लाना चाहता है। धोनी ने भी हमेशा चाहा कि वो आख़िरी ओवर तक खेलें। खेल को अंत तक लेकर जाएं।
महेंद्र सिंह धोनी ने आजीवन निचले क्रम पर बल्लेबाज़ी की। यह कठिन और धैर्यपूर्ण दायित्व है। ऊपरी क्रम पर बल्लेबाज़ी करने वाला शाहख़र्च होता है। निचले क्रम पर खेलने वाला बल्लेबाज़ किफ़ायती होता है। भारतीय समाज में अभाव, संघर्ष और आत्मत्याग के रूपक इतने गहरे हैं कि उसे धोनी में अपनी नियति दिखलाई देने लगती है। वो उसकी विवशताओं को समझता है। वो उसे परिवार के उस अग्रज की तरह लगता है, जो कष्ट सहकर भी सबके सुख का ख़याल रखता है। वो उस मां की तरह भी है, जो सबसे अंत में भोजन करती है और जितना मिलता है, उससे संतोष करती है। शायद यही कारण था कि उस दिन धोनी ने अपने से युवा, अनुभवहीन और असंयत खिलाड़ियों के नीचे खेलना स्वीकार किया। लेकिन जो खेल वह खेल रहे थे, उस से न्यूजीलैंड के खिलाड़ी मानने लगे थे कि धोनी को आउट करना आसान भी नहीं था। पर हाय रे नियति..
धोनी के खेल की एक विशिष्टता यह भी है कि वह captain never quits the boat early के मंत्र की धुन पर खेलते हैं और खेल के आखिर तक टिके रहने की योजना से खेलते हैं, वह गेंद खेलने में कंजूसी करते हैं और छक्के चौके लगाने में भी वह संयम बरतते हैं ताकि जीत का उत्सव सम्पूर्णता के साथ मनाया जा सके। इसलिए विश्व कप के सेमी -फाइनल में वह बहुत ही संभल कर एक छोर पकडे रहे और दूसरे छोर पर जडेजा का साथ देते रहे। यही एक ईमानदार संयमी खिलाड़ी का जीवन दर्शन होना चाहिए। खेल अंतत: नियमों और कौशल से संचालित होने वाला प्रतिभा है। खिलाड़ी आते हैं, जाते हैं, हार-जीत होती रहती है। किंतु जो व्यक्ति खेल रहा है, उसके व्यक्तित्व के गुण खेल समाप्त होने के बाद भी प्रासंगिक बने रहते हैं। यह सब इसलिए होता है, क्योंकि वह खेल के प्रति एक समर्पित खिलाडी हैं। उनके इस सच्चाई को भारतीय जनमानस पहचान चुका है, शायद इसलिए लता मंगेशकर उन्हें क्रिकेट खेलते रहने का आग्रह कर रही हैं।”

