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साजिश या चिंता?

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साजिश या चिंता?

    28-Sep-2019

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अश्विनीकुमार मिश्र..
 
 
 
मुंबई के आरे कॉलोनी में मेट्रो कार शेड बनाने को लेकर इन दिनों काफी माथापच्ची चल रही है। यह माथापच्ची इस लिए है कि कार शेड बनाने के लिए कोई ८००० पेड़ों को कांटा जा रहा है। इस पेडकटाई को लेकर कई सामाजिक और स्थानीय संगठन आंदोलन कर रहे हैं। मेट्रो का कार शेड न बने इसके लिए राजनीतिक दल काँग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी संस्थाएं सक्रीय हो गई हैं। कुछ संगठनों ने अदालत की भी शरण ली है। कोशिश यह है कि पेड़ों को काटने से रोका जाए, पर्यावरण की सुरक्षा की जाए, क्योंकि आरे कॉलोनी के हरेभरे क्षेत्र मुम्बई का फेफड़ा है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह ऑक्सीजन प्रदान करनेवाला क्षेत्र है। लेकिन पेड़कटाई को रोकने के लिए जो लोग लामबंद हो रहे हैं उनकी गतिविधियां असहिष्णुता गैंग की उपज लगती है। अभिनेता शेखर सुमन, संजय निरुपम, एकनाथ गायकवाड़ जैसे लोग आरे कॉलोनी को बचाने के लिए तत्पर हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने फैशन के तौर पर भी कभी झाड़ नहीं लगाया होगा। लेकिन राजनीति साधने विकास कार्य में अड़ंगा डालने की नीयत से आरे कॉलोनी के नाम पर प्रपंच चल रहा है।
 
 
उस पर से शिवसेना के युवा तुर्क नेता आदित्य ठाकरे भी पर्यावरण संरक्षण के नामपर फैले मृगजाल में फंसकर ऐसे लोगों का समर्थन कर बैठे हैं जो मेट्रो के विकास को रोकने की साजिश रच रहे हैं। उनका तर्ज भी नर्मदा बचाओ आंदोलन की रुदाली कर रहे हैं। आज कल पर्यावरण के नाम पर कुछ लोग पाखंड रचते हैं, कौचर्य करते हैं ताकि दाना पानी मिलता रहे। आरे कॉलोनी को बचाने वाले मुंबई से ज्यादा बंगलुरू में हैं। सोमवारको मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने इस बारे जो जानकारी दी है वह सोचने लायक है। उनका कहना है कि आरे की पेडकटाई को रोकने लिए कोई १३००० शिकायतों में से ११००० शिकायतें कम्प्यूटर के एक ही पाते से आये हैं। और उस कम्प्यूटर का पता बंगलुरू का है। इसे पर्यावरण जागरूकता कहा जाये या दूसरे राज्य में बैठे लोगों की साजिश जो आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।
 
 
इस से यह भी स्पष्ट होता है कि इस देश में तकनीक का सहारा लेकर विकास के कार्य में अड़ंगा डालाजा रहा है। मुख्यमंत्री की मेट्रो ओर आरे कॉलोनी को लेकर चिंता समझी जा सकती है। दरअसल मुम्बई सहित देश में मेट्रो ट्रेनों का नेटवर्क परिवहन और यातायात की नई सुविधा का आयाम है। इस आयाम को विकसित करना जरुरी क्योंकि यह पर्यावरण और आधुनिक परिवहन प्रणाली का अंग है। उसपर से कारशेड की नई जमीन के लिए सरकारी टकसाल पर ५००० करोड़ का अतिरिक्त बोझ आएगा। इस से मेट्रो का परिचालन महंगा होगा। इस बोझ को जनता को उठाना पड़ेगा। मुंबईकरों को याद होतो बान्द्रा-वरली समुद्री मार्ग को लेकर भी यही भ्रांतियां फैलाई गईं थीं। जिस कारण इसके निर्माण में समय लगा और इस समुद्री मार्ग की लागत १००० करोड़ से अधिक बढ़ गयी थी। दरअसल पर्यावरण की चिंता का एक प्रचलन चल गया है। कुछ तथाकथित लोग देश के हर कोने में बैठे हैं जो बिस्तारक के अवसर की तलाश में रहते हैं। ऐसे लोग कोई सुझाव नही देते हैं बल्कि टांग अड़ाते हैं। और मौका मिले तो सरकार को ही ब्लैकमेल करते हैं। ऐसे कई विदेश के इशारों पर काम करने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। इस बारे में सरकार को पेड़ों के बदले पेड़ लगाने की मुहीम उस स्थल पर चलानी चाहिए ताकि पैसा भी बस और आरे कॉलोनी भी।
 
 

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अश्विनीकुमार मिश्र..
 
 
 
“मुंबई के आरे कॉलोनी में मेट्रो कार शेड बनाने को लेकर इन दिनों काफी माथापच्ची चल रही है। यह माथापच्ची इस लिए है कि कार शेड बनाने के लिए कोई ८००० पेड़ों को कांटा जा रहा है। इस पेडकटाई को लेकर कई सामाजिक और स्थानीय संगठन आंदोलन कर रहे हैं। मेट्रो का कार शेड न बने इसके लिए राजनीतिक दल काँग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी संस्थाएं सक्रीय हो गई हैं। कुछ संगठनों ने अदालत की भी शरण ली है। कोशिश यह है कि पेड़ों को काटने से रोका जाए, पर्यावरण की सुरक्षा की जाए, क्योंकि आरे कॉलोनी के हरेभरे क्षेत्र मुम्बई का फेफड़ा है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह ऑक्सीजन प्रदान करनेवाला क्षेत्र है। लेकिन पेड़कटाई को रोकने के लिए जो लोग लामबंद हो रहे हैं उनकी गतिविधियां असहिष्णुता गैंग की उपज लगती है। अभिनेता शेखर सुमन, संजय निरुपम, एकनाथ गायकवाड़ जैसे लोग आरे कॉलोनी को बचाने के लिए तत्पर हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने फैशन के तौर पर भी कभी झाड़ नहीं लगाया होगा। लेकिन राजनीति साधने विकास कार्य में अड़ंगा डालने की नीयत से आरे कॉलोनी के नाम पर प्रपंच चल रहा है।”
 
 
“उस पर से शिवसेना के युवा तुर्क नेता आदित्य ठाकरे भी पर्यावरण संरक्षण के नामपर फैले मृगजाल में फंसकर ऐसे लोगों का समर्थन कर बैठे हैं जो मेट्रो के विकास को रोकने की साजिश रच रहे हैं। उनका तर्ज भी नर्मदा बचाओ आंदोलन की रुदाली कर रहे हैं। आज कल पर्यावरण के नाम पर कुछ लोग पाखंड रचते हैं, कौचर्य करते हैं ताकि दाना पानी मिलता रहे। आरे कॉलोनी को बचाने वाले मुंबई से ज्यादा बंगलुरू में हैं। सोमवारको मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने इस बारे जो जानकारी दी है वह सोचने लायक है। उनका कहना है कि आरे की पेडकटाई को रोकने लिए कोई १३००० शिकायतों में से ११००० शिकायतें कम्प्यूटर के एक ही पाते से आये हैं। और उस कम्प्यूटर का पता बंगलुरू का है। इसे पर्यावरण जागरूकता कहा जाये या दूसरे राज्य में बैठे लोगों की साजिश जो आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।”
 
 
इस से यह भी स्पष्ट होता है कि इस देश में तकनीक का सहारा लेकर विकास के कार्य में अड़ंगा डालाजा रहा है। मुख्यमंत्री की मेट्रो ओर आरे कॉलोनी को लेकर चिंता समझी जा सकती है। दरअसल मुम्बई सहित देश में मेट्रो ट्रेनों का नेटवर्क परिवहन और यातायात की नई सुविधा का आयाम है। इस आयाम को विकसित करना जरुरी क्योंकि यह पर्यावरण और आधुनिक परिवहन प्रणाली का अंग है। उसपर से कारशेड की नई जमीन के लिए सरकारी टकसाल पर ५००० करोड़ का अतिरिक्त बोझ आएगा। इस से मेट्रो का परिचालन महंगा होगा। इस बोझ को जनता को उठाना पड़ेगा। मुंबईकरों को याद होतो बान्द्रा-वरली समुद्री मार्ग को लेकर भी यही भ्रांतियां फैलाई गईं थीं। जिस कारण इसके निर्माण में समय लगा और इस समुद्री मार्ग की लागत १००० करोड़ से अधिक बढ़ गयी थी। दरअसल पर्यावरण की चिंता का एक प्रचलन चल गया है। कुछ तथाकथित लोग देश के हर कोने में बैठे हैं जो बिस्तारक के अवसर की तलाश में रहते हैं। ऐसे लोग कोई सुझाव नही देते हैं बल्कि टांग अड़ाते हैं। और मौका मिले तो सरकार को ही ब्लैकमेल करते हैं। ऐसे कई विदेश के इशारों पर काम करने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। इस बारे में सरकार को पेड़ों के बदले पेड़ लगाने की मुहीम उस स्थल पर चलानी चाहिए ताकि पैसा भी बस और आरे कॉलोनी भी।
 
 

 

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